Saturday, 4 March 2023

Hanuman Bahuk | हनुमान बाहुक



हनुमान बाहुक


"हनुमान बाहुक" गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित स्रोत है। माना जाता है कि एकबार जब कलयुग के अत्यधिक प्रकोप से श्री तुलसीदास जी के भुजाओं में असहनीय पीड़ा हो रहा था तो तुलसीदास जी ने हनुमान की स्तुति में अपने दर्द को शब्दों में वर्णन करते हुए हनुमान बाहुक की रचना की |

श्रीगणेशाय नमः
श्रीजानकीवल्लभो विजयते
श्रीमद्-गोस्वामी-तुलसीदास-कृत
 
छप्पय

सिंधु-तरन, सिय-सोच-हरन, रबि-बाल-बरन तनु ।
भुज बिसाल, मूरति कराल कालहुको काल जनु ।।
गहन-दहन-निरदहन लंक निःसंक, बंक-भुव ।
जातुधान-बलवान-मान-मद-दवन पवनसुव ।।
कह तुलसिदास सेवत सुलभ सेवक हित सन्तत निकट ।
गुन-गनत, नमत, सुमिरत, जपत समन सकल-संकट-विकट ll१ll

स्वर्न-सैल-संकास कोटि-रबि-तरुन-तेज-घन ।
उर बिसाल भुज-दंड चंड नख-बज्र बज्र-तन ।।
पिंग नयन, भृकुटी कराल रसना दसनानन ।
कपिस केस, करकस लँगूर, खल-दल बल भानन ।।
कह तुलसिदास बस जासु उर मारुतसुत मूरति बिकट ।
संताप पाप तेहि पुरुष पहिं सपनेहुँ नहिं आवत निकट ll२ll

झूलना

पंचमुख-छमुख-भृगु मुख्य भट असुर सुर, सर्व-सरि-समर समरत्थ सूरो ।
बाँकुरो बीर बिरुदैत बिरुदावली, बेद बंदी बदत पैजपूरो ।।
जासु गुनगाथ रघुनाथ कह, जासुबल, बिपुल-जल-भरित जग-जलधि झूरो ।
दुवन-दल-दमनको कौन तुलसीस है, पवन को पूत रजपूत रुरो ll३ll

घनाक्षरी

भानुसों पढ़न हनुमान गये भानु मन-अनुमानि सिसु-केलि कियो फेरफार सो ।
पाछिले पगनि गम गगन मगन-मन, क्रम को न भ्रम, कपि बालक बिहार सो ।।
कौतुक बिलोकि लोकपाल हरि हर बिधि, लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खभार सो।
बल कैंधौं बीर-रस धीरज कै, साहस कै, तुलसी सरीर धरे सबनि को सार सो ll४ll

भारत में पारथ के रथ केथू कपिराज, गाज्यो सुनि कुरुराज दल हल बल भो ।
कह्यो द्रोन भीषम समीर सुत महाबीर, बीर-रस-बारि-निधि जाको बल जल भो ।।
बानर सुभाय बाल केलि भूमि भानु लागि, फलँग फलाँग हूँतें घाटि नभतल भो ।
नाई-नाई माथ जोरि-जोरि हाथ जोधा जोहैं, हनुमान देखे जगजीवन को फल भो ll५ll

गो-पद पयोधि करि होलिका ज्यों लाई लंक, निपट निसंक परपुर गलबल भो ।
द्रोन-सो पहार लियो ख्याल ही उखारि कर, कंदुक-ज्यों कपि खेल बेल कैसो फल भो ।।
संकट समाज असमंजस भो रामराज, काज जुग पूगनि को करतल पल भो ।
साहसी समत्थ तुलसी को नाह जाकी बाँह, लोकपाल पालन को फिर थिर थल भो ll६ll

कमठ की पीठि जाके गोडनि की गाड़ैं मानो, नाप के भाजन भरि जल निधि जल भो ।
जातुधान-दावन परावन को दुर्ग भयो, महामीन बास तिमि तोमनि को थल भो ।।
कुम्भकरन-रावन पयोद-नाद-ईंधन को, तुलसी प्रताप जाको प्रबल अनल भो ।
भीषम कहत मेरे अनुमान हनुमान, सारिखो त्रिकाल न त्रिलोक महाबल भो ll७ll

दूत रामराय को, सपूत पूत पौनको, तू अंजनी को नन्दन प्रताप भूरि भानु सो ।
सीय-सोच-समन, दुरित दोष दमन, सरन आये अवन, लखन प्रिय प्रान सो ।।
दसमुख दुसह दरिद्र दरिबे को भयो, प्रकट तिलोक ओक तुलसी निधान सो ।
ज्ञान गुनवान बलवान सेवा सावधान, साहेब सुजान उर आनु हनुमान सो ll८ll
 
दवन-दुवन-दल भुवन-बिदित बल, बेद जस गावत बिबुध बंदीछोर को ।
पाप-ताप-तिमिर तुहिन-विघटन-पटु, सेवक-सरोरुह सुखद भानु भोर को ।।
लोक-परलोक तें बिसोक सपने न सोक, तुलसी के हिये है भरोसो एक ओर को ।
राम को दुलारो दास बामदेव को निवास, नाम कलि-कामतरु केसरी-किसोर को ll९ll
 
महाबल-सीम महाभीम महाबान इत, महाबीर बिदित बरायो रघुबीर को ।
कुलिस-कठोर तनु जोरपरै रोर रन, करुना-कलित मन धारमिक धीर को ।।
दुर्जन को कालसो कराल पाल सज्जन को, सुमिरे हरनहार तुलसी की पीर को ।
सीय-सुख-दायक दुलारो रघुनायक को, सेवक सहायक है साहसी समीर को ll१०ll

रचिबे को बिधि जैसे, पालिबे को हरि, हर मीच मारिबे को, ज्याईबे को सुधापान भो ।
बामदेव-रुप भूप राम के सनेही, नाम लेत-देत अर्थ धर्म काम निरबान हौ ।।
आपने प्रभाव सीताराम के सुभाव सील, लोक-बेद-बिधि के बिदूष हनुमान हौ ।
मन की बचन की करम की तिहूँ प्रकार, तुलसी तिहारो तुम साहेब सुजान हौ ll१४ll

मन को अगम, तन सुगम किये कपीस, काज महाराज के समाज साज साजे हैं ।
देव-बंदी छोर रनरोर केसरी किसोर, जुग जुग जग तेरे बिरद बिराजे हैं ।
बीर बरजोर, घटि जोर तुलसी की ओर, सुनि सकुचाने साधु खल गन गाजे हैं ।
बिगरी सँवार अंजनी कुमार कीजे मोहिं, जैसे होत आये हनुमान के निवाजे हैं ll१५ll
 
सवैया

जान सिरोमनि हौ हनुमान सदा जन के मन बास तिहारो ।
ढ़ारो बिगारो मैं काको कहा केहि कारन खीझत हौं तो तिहारो ।।
साहेब सेवक नाते तो हातो कियो सो तहाँ तुलसी को न चारो ।
दोष सुनाये तें आगेहुँ को होशियार ह्वैं हों मन तौ हिय हारो ll१६ll 

तेरे थपे उथपै न महेस, थपै थिरको कपि जे घर घाले ।
तेरे निवाजे गरीब निवाज बिराजत बैरिन के उर साले ।।
संकट सोच सबै तुलसी लिये नाम फटै मकरी के से जाले ।
बूढ़ भये, बलि, मेरिहि बार, कि हारि परे बहुतै नत पाले ll१७ll

सिंधु तरे, बड़े बीर दले खल, जारे हैं लंक से बंक मवा से ।
तैं रनि-केहरि केहरि के बिदले अरि-कुंजर छैल छवा से ।।
तोसों समत्थ सुसाहेब सेई सहै तुलसी दुख दोष दवा से ।
बानर बाज ! बढ़े खल-खेचर, लीजत क्यों न लपेटि लवा-से ll१८ll

अच्छ-विमर्दन कानन-भानि दसानन आनन भा न निहारो ।
बारिदनाद अकंपन कुंभकरन्न-से कुंजर केहरि-बारो ।।
राम-प्रताप-हुतासन, कच्छ, बिपच्छ, समीर समीर-दुलारो ।
पाप-तें साप-तें ताप तिहूँ-तें सदा तुलसी कहँ सो रखवारो ll१९ll

घनाक्षरी

जानत जहान हनुमान को निवाज्यौ जन, मन अनुमानि बलि, बोल न बिसारिये ।
सेवा-जोग तुलसी कबहुँ कहा चूक परी, साहेब सुभाव कपि साहिबी सँभारिये ।।
अपराधी जानि कीजै सासति सहस भाँति, मोदक मरै जो ताहि माहुर न मारिये ।
साहसी समीर के दुलारे रघुबीर जू के, बाँह पीर महाबीर बेगि ही निवारिये ll२०ll

बालक बिलोकि, बलि बारेतें आपनो कियो, दीनबन्धु दया कीन्हीं निरुपाधि न्यारिये ।
रावरो भरोसो तुलसी के, रावरोई बल, आस रावरीयै दास रावरो बिचारिये ।।
बड़ो बिकराल कलि, काको न बिहाल कियो, माथे पगु बलि को, निहारि सो निवारिये ।
केसरी किसोर, रनरोर, बरजोर बीर, बाँहुपीर राहुमातु ज्यौं पछारि मारिये ll२१ll

राम के गुलामनि को कामतरु रामदूत, मोसे दीन दूबरे को तकिया तिहारिये ।।
साहेब समर्थ तोसों तुलसी के माथे पर, सोऊ अपराध बिनु बीर, बाँधि मारिये ।
पोखरी बिसाल बाँहु, बलि, बारिचर पीर, मकरी ज्यौं पकरि कै बदन बिदारिये ll२२ll 

राम को सनेह, राम साहस लखन सिय, राम की भगति, सोच संकट निवारिये ।
मुद-मरकट रोग-बारिनिधि हेरि हारे, जीव-जामवंत को भरोसो तेरो भारिये ।।
कूदिये कृपाल तुलसी सुप्रेम-पब्बयतें, सुथल सुबेल भालू बैठि कै बिचारिये ।
महाबीर बाँकुरे बराकी बाँह-पीर क्यों न, लंकिनी ज्यों लात-घात ही मरोरि मारिये ll२३ll
 
लोक-परलोकहुँ तिलोक न बिलोकियत, तोसे समरथ चष चारिहूँ निहारिये ।
कर्म, काल, लोकपाल, अग-जग जीवजाल, नाथ हाथ सब निज महिमा बिचारिये ।।
खास दास रावरो, निवास तेरो तासु उर, तुलसी सो देव दुखी देखियत भारिये ।
बात तरुमूल बाँहुसूल कपिकच्छु-बेलि, उपजी सकेलि कपिकेलि ही उखारिये ll२४ll 

करम-कराल-कंस भूमिपाल के भरोसे, बकी बकभगिनी काहू तें कहा डरैगी ।
बड़ी बिकराल बाल घातिनी न जात कहि, बाँहूबल बालक छबीले छोटे छरैगी ।।
आई है बनाइ बेष आप ही बिचारि देख, पाप जाय सबको गुनी के पाले परैगी ।
पूतना पिसाचिनी ज्यौं कपिकान्ह तुलसी की, बाँहपीर महाबीर तेरे मारे मरैगी ll२५ll

भालकी कि कालकी कि रोष की त्रिदोष की है, बेदन बिषम पाप ताप छल छाँह की ।
करमन कूट की कि जन्त्र मन्त्र बूट की, पराहि जाहि पापिनी मलीन मन माँह की ।।
पैहहि सजाय, नत कहत बजाय तोहि, बाबरी न होहि बानि जानि कपि नाँह की ।
आन हनुमान की दुहाई बलवान की, सपथ महाबीर की जो रहै पीर बाँह की ll२६ll
 
सिंहिका सँहारि बल, सुरसा सुधारि छल, लंकिनी पछारि मारि बाटिका उजारी है ।
लंक परजारि मकरी बिदारि बारबार, जातुधान धारि धूरिधानी करि डारी है ।।
तोरि जमकातरि मंदोदरी कढ़ोरि आनी, रावन की रानी मेघनाद महँतारी है ।
भीर बाँह पीर की निपट राखी महाबीर, कौन के सकोच तुलसी के सोच भारी है ll२७ll 

तेरो बालि केलि बीर सुनि सहमत धीर, भूलत सरीर सुधि सक्र-रबि-राहु की ।
तेरी बाँह बसत बिसोक लोकपाल सब, तेरो नाम लेत रहै आरति न काहु की ।।
साम दान भेद बिधि बेदहू लबेद सिधि, हाथ कपिनाथ ही के चोटी चोर साहु की ।
आलस अनख परिहास कै सिखावन है, एते दिन रही पीर तुलसी के बाहु की ll२८ll
 
टूकनि को घर-घर डोलत कँगाल बोलि, बाल ज्यों कृपाल नतपाल पालि पोसो है ।
कीन्ही है सँभार सार अँजनी कुमार बीर, आपनो बिसारि हैं न मेरेहू भरोसो है ।।
इतनो परेखो सब भाँति समरथ आजु, कपिराज साँची कहौं को तिलोक तोसो है ।
सासति सहत दास कीजे पेखि परिहास, चीरी को मरन खेल बालकनि को सो है ll२९ll

आपने ही पाप तें त्रिपात तें कि साप तें, बढ़ी है बाँह बेदन कही न सहि जाति है ।
औषध अनेक जन्त्र मन्त्र टोटकादि किये, बादि भये देवता मनाये अधिकाति है ।।
करतार, भरतार, हरतार, कर्म काल, को है जगजाल जो न मानत इताति है ।
चेरो तेरो तुलसी तू मेरो कह्यो राम दूत, ढील तेरी बीर मोहि पीर तें पिराति है ll३०ll
 
दूत राम राय को, सपूत पूत बाय को, समत्व हाथ पाय को सहाय असहाय को ।
बाँकी बिरदावली बिदित बेद गाइयत, रावन सो भट भयो मुठिका के घाय को ।।
एते बड़े साहेब समर्थ को निवाजो आज, सीदत सुसेवक बचन मन काय को ।
थोरी बाँह पीर की बड़ी गलानि तुलसी को, कौन पाप कोप, लोप प्रकट प्रभाय को ll३१ll 

देवी देव दनुज मनुज मुनि सिद्ध नाग, छोटे बड़े जीव जेते चेतन अचेत हैं ।
पूतना पिसाची जातुधानी जातुधान बाम, राम दूत की रजाइ माथे मानि लेत हैं ।।
घोर जन्त्र मन्त्र कूट कपट कुरोग जोग, हनुमान आन सुनि छाड़त निकेत हैं ।
क्रोध कीजे कर्म को प्रबोध कीजे तुलसी को, सोध कीजे तिनको जो दोष दुख देत हैं ll३२ll
 
तेरे बल बानर जिताये रन रावन सों, तेरे घाले जातुधान भये घर-घर के ।
तेरे बल रामराज किये सब सुरकाज, सकल समाज साज साजे रघुबर के ।।
तेरो गुनगान सुनि गीरबान पुलकत, सजल बिलोचन बिरंचि हरि हर के ।
तुलसी के माथे पर हाथ फेरो कीसनाथ, देखिये न दास दुखी तोसो कनिगर के ll३३ll 

पालो तेरे टूक को परेहू चूक मूकिये न, कूर कौड़ी दूको हौं आपनी ओर हेरिये ।
भोरानाथ भोरे ही सरोष होत थोरे दोष, पोषि तोषि थापि आपनी न अवडेरिये ।।
अँबु तू हौं अँबुचर, अँबु तू हौं डिंभ सो न, बूझिये बिलंब अवलंब मेरे तेरिये ।
बालक बिकल जानि पाहि प्रेम पहिचानि, तुलसी की बाँह पर लामी लूम फेरिये ll३४ll 

घेरि लियो रोगनि, कुजोगनि, कुलोगनि ज्यौं, बासर जलद घन घटा धुकि धाई है ।
बरसत बारि पीर जारिये जवासे जस, रोष बिनु दोष धूम-मूल मलिनाई है ।।
करुनानिधान हनुमान महा बलवान, हेरि हँसि हाँकि फूँकि फौजैं ते उड़ाई है ।
खाये हुतो तुलसी कुरोग राढ़ राकसनि, केसरी किसोर राखे बीर बरिआई है ll३५ll

सवैया

राम गुलाम तु ही हनुमान गोसाँई सुसाँई सदा अनुकूलो ।
पाल्यो हौं बाल ज्यों आखर दू पितु मातु सों मंगल मोद समूलो ।।
बाँह की बेदन बाँह पगार पुकारत आरत आनँद भूलो ।
श्री रघुबीर निवारिये पीर रहौं दरबार परो लटि लूलो ll३६ll

घनाक्षरी

काल की करालता करम कठिनाई कीधौं, पाप के प्रभाव की सुभाय बाय बावरे ।
बेदन कुभाँति सो सही न जाति राति दिन, सोई बाँह गही जो गही समीर डाबरे ।।
लायो तरु तुलसी तिहारो सो निहारि बारि, सींचिये मलीन भो तयो है तिहुँ तावरे ।
भूतनि की आपनी पराये की कृपा निधान, जानियत सबही की रीति राम रावरे ll३७ll

पाँय पीर पेट पीर बाँह पीर मुँह पीर, जरजर सकल पीर मई है ।
देव भूत पितर करम खल काल ग्रह, मोहि पर दवरि दमानक सी दई है ।।
हौं तो बिनु मोल के बिकानो बलि बारेही तें, ओट राम नाम की ललाट लिखि लई है ।
कुँभज के किंकर बिकल बूढ़े गोखुरनि, हाय राम राय ऐसी हाल कहूँ भई है ll३८ll

बाहुक-सुबाहु नीच लीचर-मरीच मिलि, मुँहपीर केतुजा कुरोग जातुधान हैं ।
राम नाम जगजाप कियो चहों सानुराग, काल कैसे दूत भूत कहा मेरे मान हैं ।।
सुमिरे सहाय राम लखन आखर दोऊ, जिनके समूह साके जागत जहान हैं ।
तुलसी सँभारि ताड़का सँहारि भारि भट, बेधे बरगद से बनाइ बानवान हैं ll३९ll
 
बालपने सूधे मन राम सनमुख भयो, राम नाम लेत माँगि खात टूकटाक हौं ।
परयो लोक-रीति में पुनीत प्रीति राम राय, मोह बस बैठो तोरि तरकि तराक हौं ।।
खोटे-खोटे आचरन आचरत अपनायो, अंजनी कुमार सोध्यो रामपानि पाक हौं ।
तुलसी गुसाँई भयो भोंडे दिन भूल गयो, ताको फल पावत निदान परिपाक हौं ll४०ll
 
असन-बसन-हीन बिषम-बिषाद-लीन, देखि दीन दूबरो करै न हाय हाय को ।
तुलसी अनाथ सो सनाथ रघुनाथ कियो, दियो फल सील सिंधु आपने सुभाय को ।।
नीच यहि बीच पति पाइ भरु हाईगो, बिहाइ प्रभु भजन बचन मन काय को ।
ता तें तनु पेषियत घोर बरतोर मिस, फूटि फूटि निकसत लोन राम राय को ll४१ll
 
जीओं जग जानकी जीवन को कहाइ जन, मरिबे को बारानसी बारि सुरसरि को ।
तुलसी के दुहूँ हाथ मोदक हैं ऐसे ठाँउ, जाके जिये मुये सोच करिहैं न लरि को ।।
मोको झूटो साँचो लोग राम को कहत सब, मेरे मन मान है न हर को न हरि को ।
भारी पीर दुसह सरीर तें बिहाल होत, सोऊ रघुबीर बिनु सकै दूर करि को ll४२ll

सीतापति साहेब सहाय हनुमान नित, हित उपदेश को महेस मानो गुरु कै ।
मानस बचन काय सरन तिहारे पाँय, तुम्हरे भरोसे सुर मैं न जाने सुर कै ।।
ब्याधि भूत जनित उपाधि काहु खल की, समाधि कीजे तुलसी को जानि जन फुर कै ।
कपिनाथ रघुनाथ भोलानाथ भूतनाथ, रोग सिंधु क्यों न डारियत गाय खुर कै ll४३ll
 
कहों हनुमान सों सुजान राम राय सों, कृपानिधान संकर सों सावधान सुनिये ।
हरष विषाद राग रोष गुन दोष मई, बिरची बिरञ्ची सब देखियत दुनिये ।।
माया जीव काल के करम के सुभाय के, करैया राम बेद कहैं साँची मन गुनिये ।
तुम्ह तें कहा न होय हा हा सो बुझैये मोहि, हौं हूँ रहों मौनही बयो सो जानि लुनिये ll४४ll

Thursday, 2 March 2023

Hanuman Chalisa with Hindi Meaning |हनुमान चालीसा हिंदी अर्थ के साथ



|| ॐ श्री हनुमते नमः ||


|| दोहा ||

श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि |
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ||

अर्थ – श्री गुरु के चरण कमल के धूल से अपने मन रुपी दर्पण को निर्मल करके प्रभु श्रीराम के गुणों का वर्णन करता हूँ जो चारों प्रकार के फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाला है।

बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवन-कुमार |
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेस बिकार ||

हिंदी अर्थ : “हे पवन कुमार! मैं आपको सुमिरन करता हूँ। मुझे बुद्धिहीन जानकार सुनिए और बल, बुद्धि, विद्या दीजिये और मेरे क्लेश और विकार हर लीजिये।

|| चौपाई ||

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर |
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ||||


अर्थ – ज्ञान गुण के सागर हनुमान जी की जय। तीनों लोकों को अपनी कीर्ति से प्रकाशित करने वाले कपीश की जय।

राम दूत अतुलित बल धामा |
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा ||२||


अर्थ – हे अतुलित बल के धाम रामदूत हनुमान आप अंजनिपुत्र और पवनसुत के नाम से संसार में जाने जाते हैं।

महाबीर बिक्रम बजरंगी |
कुमति निवार सुमति के संगी ||३||


अर्थ – हे महावीर आप वज्र के समान अंगों वाले हैं और अपने भक्तों की कुमति दूर करके उन्हें सुमति प्रदान करते हैं।

कंचन बरन बिराज सुबेसा |
कानन कुण्डल कुँचित केसा ||४||


अर्थ – आपके स्वर्ण के सामान कांतिवान शरीर पर सुन्दर वस्त्र सुशोभित हो रही है। आपके कानो में कुण्डल और बाल घुंघराले हैं।

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै |
काँधे मूँज जनेउ साजै ||५||


अर्थ – आपने अपने हाथों में वज्र के समान कठोर गदा और ध्वजा धारण किया है। कंधे पर मुंज और जनेऊ भी धारण किया हुआ है।

संकर सुवन केसरी नंदन |
तेज प्रताप महा जग वंदन ||६||


अर्थ – आप भगवान शंकर के अवतार और केसरीनन्दन हैं। आप परम तेजस्वी और जगत में वंदनीय हैं।

बिद्यावान गुनी अति चातुर |
राम काज करिबे को आतुर ||७||


अर्थ – आप विद्यावान, गुनी और अत्यंत चतुर हैं और प्रभु श्रीराम की सेवा में सदैव तत्पर रहते हैं।

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया |
राम लखन सीता मन बसिया ||८||


अर्थ – आप प्रभु श्रीराम की कथा सुनने के लिए सदा लालायित रहते हैं। राम लक्ष्मण और सीता सदा आपके ह्रदय में विराजते हैं।

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा |
बिकट रूप धरि लंक जरावा ||||


अर्थ – आपने अति लघु रूप धारण करके सीता माता को दर्शन दिया और विकराल रूप धारण करके लंका को जलाया।

भीम रूप धरि असुर सँहारे |
रामचन्द्र के काज सँवारे ||१०||


अर्थ – आपने विशाल रूप धारण करके असुरों का संहार किया और श्रीराम के कार्य को पूर्ण किया।

लाय सजीवन लखन जियाये |
श्री रघुबीर हरषि उर लाये ||||


अर्थ – आपने संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण के प्राणो की रक्षा की। इस कार्य से प्रसन्न होकर प्रभु श्रीराम ने आपको ह्रदय से लगाया।

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई |
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ||२||


अर्थ – भगवान श्रीराम ने आपकी बहुत प्रसंशा की और कहा कि हे हनुमान तुम मुझे भरत के समान ही अत्यंत प्रिय हो।

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं |
अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं ||३||


अर्थ – हजार मुख वाले शेषनाग तुम्हारे यश का गान करें ऐसा कहकर श्रीराम ने आपको गले लगाया।

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा |
नारद सारद सहित अहीसा ||४||


अर्थ : “श्री सनक, श्री सनातन, श्री सनन्दन, श्री सनत्कुमार आदि मुनि ब्रह्मा आदि देवता नारद जी, सरस्वती जी, शेषनाग जी सब आपका गुण गान करते है।”

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते |
कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ||५||


अर्थ : “यमराज, कुबेर आदि सब दिशाओं के रक्षक, कवि विद्वान, पंडित या कोई भी आपके यश का पूर्णतः वर्णन नहीं कर सकते।”

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा |
राम मिलाय राज पद दीन्हा ||६||


अर्थ – आपने सुग्रीव पर उपकार किया और उन्हें राम से मिलाया और राजपद प्राप्त कराया।

तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना |
लंकेस्वर भए सब जग जाना ||७||


अर्थ – आपके सलाह को मानकर विभीषण लंकेश्वर हुए ये सारा संसार जानता है।

जुग सहस्र जोजन पर भानू |
लील्यो ताहि मधुर फल जानू ||८||

अर्थ – हे हनुमान जी आपने बाल्यावस्था में ही हजारों योजन दूर स्थित सूर्य को मीठा फल जानकर खा लिया था।

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं |
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ||||


अर्थ – आपने भगवान राम की अंगूठी अपने मुख में रखकर विशाल समुद्र को लाँघ गए थे तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं।

दुर्गम काज जगत के जेते |
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ||२||


अर्थ – संसार में जितने भी दुर्गम कार्य हैं वे आपकी कृपा से सरल हो जाते हैं।

राम दुआरे तुम रखवारे |
होत न आज्ञा बिनु पैसारे ||||


अर्थ – भगवान राम के द्वारपाल आप ही हैं आपकी आज्ञा के बिना उनके दरबार में प्रवेश नहीं मिलता।

सब सुख लहै तुम्हारी सरना |
तुम रच्छक काहू को डर ना ||२||


अर्थ – आपकी शरण में आए हुए को सब सुख मिल जाते हैं। आप जिसके रक्षक हैं उसे किसी का डर नहीं।

आपन तेज सम्हारो आपै |
तीनों लोक हाँक तें काँपै ||३||


अर्थ – हे महावीर, अपने तेज के बल को स्वयं आप ही संभाल सकते हैं। आपकी एक हुंकार से तीनो लोक कांपते हैं।

भूत पिसाच निकट नहिं आवै |
महाबीर जब नाम सुनावै ||४||


अर्थ – आपका नाम मात्र लेने से भूत पिशाच भाग जाते हैं और नजदीक नहीं आते।

नासै रोग हरे सब पीरा |
जपत निरन्तर हनुमत बीरा ||५||


अर्थ – हनुमान जी के नाम का निरंतर जप करने से सभी प्रकार के रोग और पीड़ा नष्ट हो जाते हैं।

संकट तें हनुमान छुड़ावै |
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ||२६||


अर्थ – जो भी मन क्रम और वचन से हनुमान जी का ध्यान करता है वो संकटों से बच जाता है।

सब पर राम तपस्वी राजा |
तिन के काज सकल तुम साजा ||७||

अर्थ – जो राम स्वयं भगवान हैं उनके भी समस्त कार्यों का संपादन आपके ही द्वारा किया गया।

और मनोरथ जो कोई लावै |
सोई अमित जीवन फल पावै ||२८||


अर्थ – हे हनुमान जी आप भक्तों के सब प्रकार के मनोरथ पूर्ण करते हैं।

चारों जुग परताप तुम्हारा |
है परसिद्ध जगत उजियारा ||||


अर्थ – हे हनुमान जी, आपके नाम का प्रताप चारो युगों (सतयुग, त्रेता , द्वापर और कलियुग ) में है।

साधु सन्त के तुम रखवारे |
असुर निकन्दन राम दुलारे ||||


अर्थ – आप साधु संतों के रखवाले, असुरों का संहार करने वाले और प्रभु श्रीराम के अत्यंत प्रिय हैं।

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता |
अस बर दीन जानकी माता ||||

अर्थ – आप आठों प्रकार के सिद्धि और नौ निधियों के प्रदाता हैं और ये वरदान आपको जानकी माता ने दिया है।

राम रसायन तुम्हरे पासा |
सदा रहो रघुपति के दासा ||२||


अर्थ – आप अनंत काल से प्रभु श्रीराम के भक्त हैं और राम नाम की औषधि सदैव आपके पास रहती है।

तुम्हरे भजन राम को पावै |
जनम जनम के दुख बिसरावै ||३||


अर्थ – आपकी भक्ति से जन्म जन्मांतर के दुखों से मुक्ति देने वाली प्रभु श्रीराम की कृपा प्राप्त होती है।

अन्त काल रघुबर पुर जाई |
जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई ||४||


अर्थ – वो अंत समय में मृत्यु के बाद भगवान के लोक में जाता है और जन्म लेने पर हरि भक्त बनता है।

और देवता चित्त न धरई |
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ||५||


अर्थ – किसी और देवता की पूजा न करते हुए भी सिर्फ आपकी कृपा से ही सभी प्रकार के फलों की प्राप्ति हो जाती है।

संकट कटै मिटै सब पीरा |
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ||६||


अर्थ – जो भी व्यक्ति हनुमान जी का ध्यान करता है उसके सब प्रकार के संकट और पीड़ा मिट जाते हैं।

जय जय जय हनुमान गोसाईं |
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ||७||


अर्थ – हे हनुमान गोसाईं आपकी जय हो। आप मुझ पर गुरुदेव के समान कृपा करें।

जो सत बार पाठ कर कोई |
छूटहि बन्दि महा सुख होई ||८||


अर्थ – जो इस हनुमान चालीसा का सौ बार पाठ करता है उसके सारे कष्ट दूर हो जाते हैं और उसे महान सुख की प्राप्ति होती है।

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा |
होय सिद्धि साखी गौरीसा ||||


अर्थ – जो इस हनुमान चालीसा का पाठ करता है उसे निश्चित ही सिद्धि की प्राप्ति होती है, इसके साक्षी स्वयं भगवान शिव हैं।

तुलसीदास सदा हरि चेरा |
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ||||


अर्थ – हे हनुमान जी, तुलसीदास सदैव प्रभु श्रीराम का भक्त है ऐसा समझकर आप मेरे ह्रदय में निवास करें।

|| दोहा ||

पवनतनय संकट हरन मंगल मूरति रूप |
राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप ||

अर्थ – हे मंगल मूर्ति पवनसुत हनुमान जी, आप मेरे ह्रदय में राम लखन सीता सहित निवास कीजिये।

Wednesday, 22 February 2023

गणेश जी की महामंत्र



वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥


हे घुमावदार सूंड वाले, विशाल शरीर वाले, करोड़ सूर्य के समान महान प्रतिभाशाली।
हे प्रभु! हमेशा मेरे सारे कार्य बिना विघ्न के पूरे करने की कृपा करें l

Monday, 20 February 2023

Madhurashtakam in Sanskrit | मधुराष्टकम्



मधुराष्टकम्:


अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरं l
हृदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ll१ll

वचनं मधुरं चरितं मधुरं वसनं मधुरं वलितं मधुरं l
चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ll२ll

वेणुर्मधुरो रेणुर्मधुरः पाणिर्मधुरः पादौ मधुरौ l
नृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ll३ll

गीतं मधुरं पीतं मधुरं भुक्तं मधुरं सुप्तं मधुरं l
रूपं मधुरं तिलकं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ll४ll

करणं मधुरं तरणं मधुरं हरणं मधुरं रमणं मधुरं l
वमितं मधुरं शमितं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ll५ll

गुञ्जा मधुरा माला मधुरा यमुना मधुरा वीची मधुरा l
सलिलं मधुरं कमलं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ll६ll

गोपी मधुरा लीला मधुरा युक्तं मधुरं मुक्तं मधुरं l
दृष्टं मधुरं सृष्टं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ll७ll

गोपा मधुरा गावो मधुरा यष्टिर्मधुरा सृष्टिर्मधुरा l
दलितं मधुरं फलितं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ll८ll

- श्रीवल्लभाचार्य कृत

Wednesday, 8 February 2023

Annapoorna Stotram | अन्नपूर्णा स्तोत्रम्

अन्नपूर्णा स्तोत्रम्

नित्यानन्दकरी वराभयकरी सौन्दर्यरत्नाकरी
निर्धूताखिलघोरपावनकरी प्रत्यक्षमाहेश्वरी ।
प्रालेयाचलवंशपावनकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥१॥

नानारत्नविचित्रभूषणकरी हेमाम्बराडम्बरी
मुक्ताहारविलम्बमानविलसद्वक्षोजकुम्भान्तरी ।
काश्मीरागरुवासिताङ्गरुचिरे काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥२॥

योगानन्दकरी रिपुक्षयकरी धर्मार्थनिष्ठाकरी
चन्द्रार्कानलभासमानलहरी त्रैलोक्यरक्षाकरी ।
सर्वैश्वर्यसमस्तवाञ्छितकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥३॥

कैलासाचलकन्दरालयकरी गौरी उमा शङ्करी
कौमारी निगमार्थगोचरकरी ओङ्कारबीजाक्षरी ।
मोक्षद्वारकपाटपाटनकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥४॥

दृश्यादृश्यविभूतिवाहनकरी ब्रह्माण्डभाण्डोदरी
लीलानाटकसूत्रभेदनकरी विज्ञानदीपाङ्कुरी ।
श्रीविश्वेशमनःप्रसादनकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥५॥

उर्वीसर्वजनेश्वरी भगवती मातान्नपूर्णेश्वरी
वेणीनीलसमानकुन्तलहरी नित्यान्नदानेश्वरी ।
सर्वानन्दकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥६॥

आदिक्षान्तसमस्तवर्णनकरी शम्भोस्त्रिभावाकरी
काश्मीरात्रिजलेश्वरी त्रिलहरी नित्याङ्कुरा शर्वरी ।
कामाकाङ्क्षकरी जनोदयकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥७॥

देवी सर्वविचित्ररत्नरचिता दाक्षायणी सुन्दरी
वामं स्वादुपयोधरप्रियकरी सौभाग्यमाहेश्वरी ।
भक्ताभीष्टकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥८॥

चन्द्रार्कानलकोटिकोटिसदृशा चन्द्रांशुबिम्बाधरी
चन्द्रार्काग्निसमानकुन्तलधरी चन्द्रार्कवर्णेश्वरी ।
मालापुस्तकपाशासाङ्कुशधरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥९॥

क्षत्रत्राणकरी महाऽभयकरी माता कृपासागरी
साक्षान्मोक्षकरी सदा शिवकरी विश्वेश्वरश्रीधरी ।
दक्षाक्रन्दकरी निरामयकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥१०॥

अन्नपूर्णे सदापूर्णे शङ्करप्राणवल्लभे ।
ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति ॥११॥

माता च पार्वती देवी पिता देवो महेश्वरः ।
बान्धवाः शिवभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम् ॥१२॥

- श्री शङ्कराचार्य कृतं

Panchagni vidyā | पंचाग्नि विद्या


पंचाग्नि विद्या

पंचाग्नि विद्या का उद्देश्य, हिंदू धर्म में पांच आग पर ध्यान, सांसारिक जीवन के लिए तीव्र वैराग्य विकसित करना और लोगों का ध्यान मोक्ष या मुक्ति की ओर मोड़ना है। छांदोग्य उपनिषद अध्याय V में पंचाग्नि विद्या का उल्लेख है। इसे जिवाला के पुत्र राजा प्रवाहण ने अपने शिष्य श्वेतकेतु को पढ़ाया था।

प्रतीकात्मक रूप से, पंचाग्नि विद्या व्यक्ति को जीवन यात्रा में आने वाली कठिनाइयों के बारे में बताती है। इसलिए जब साधक को मनुष्य रूप प्राप्त हो जाए तो साधक को उसका प्रयोग जन्म मरण के चक्र से बचने के लिए करना चाहिए।

पंचाग्नि विद्या पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव की पत्नी पार्वती ने पहली बार शिव तत्व, कुल मुक्ति प्राप्त करने के लिए किया था। 

पंचाग्नि विद्या में पाँच अग्नि (अग्नि) हैं:

• स्वर्ग 

• वर्षा देवता 

• धरती 

• नर 

• महिला

हिंदू धार्मिक शिक्षाओं के अनुसार, वैराग्य मुक्ति के प्रभावी साधनों में से एक है - दुख और दुख से मुक्ति। 

पृथ्वी पर आनंद प्राप्त करने के लिए दुनिया में एक शरीर में जन्म के दर्द और खतरों के बारे में लगातार सोचने की जरूरत है।

पंचाग्नि विद्या जन्म और मृत्यु के समय होने वाले दुखों की गहराई से शिक्षा देती है। पांच अग्नियों का ध्यान एक साधक में वैराग्य की भावना उत्पन्न करता है।

मान्यता है कि पंच अग्नियों को पांच द्रव्य आहुति दी जाती है

• स्वर्ग के प्रति आस्था 

• सोम वर्षा देवता 

• पृथ्वी पर वर्षा

• मनुष्य को भोजन

• महिला को वीर्य द्रव

स्त्री के गर्भ में पंचम आहुति देने पर स्वयं को शरीर प्राप्त होता है।

एक आत्मा जो अच्छे कर्मों के बल पर स्वर्गीय दुनिया में चढ़ गई है, उस पुण्य की थकावट पर पृथ्वी पर एक और जीवन लेने के लिए, स्वर्ग से बारिश के रूप में उतरती है।वहाँ पृथ्वी में, स्वयं एक पौधे पर उगने वाले अनाज में प्रवेश करता है और फिर उस नर के रक्त में प्रवेश करता है जो उस खाद्यान्न को खाता है जो शुक्राणु में बदल जाता है। अन्त में, जब वीर्य स्त्राव सहवास के समय स्त्री के गर्भ में प्रवेश करता है, तो उसके साथ आत्मा भी गर्भ में प्रवेश करती है। गर्भ में यह सन्निहित हो जाता है।

यह सब दिखाता है कि गर्भ तक जाने की यात्रा कितनी कठिन और दर्दनाक है, खासकर जब अनाज काटा जाता है, सुखाया जाता है, उबाला जाता है, उबाला जाता है, खाया जाता है, दांतों से कुचला जाता है, पाचक तरल पदार्थों में मिलाया जाता है, पाचन अग्नि द्वारा जलाया जाता है - अंत में माता के गर्भ में नौ महीने के कष्टदायक प्रवास में प्रवेश करें।

Tuesday, 7 February 2023

Srividya: Tithi Nitya Devi | तिथि नित्य देवी


तिथि नित्य देवी

श्री ललिता की पूजा श्री विद्या उपासना का अंग है। श्री ललिता आद्या शक्ति हैं जो सत, आनंद और पूर्णा हैं - सदानंदपूर्णा। उसके चारों ओर 15 अंग देवता या अवतार देवता हैं जिन्हें नित्य देवी कहा जाता है। ये नित्य देवियाँ अपने 15 गुणों के साथ पाँच मूल तत्वों, यानी पंच भूतों का प्रतिनिधित्व करती हैं। प्रत्येक पंचभूत / तत्व में सत्व, रजस और तमो गुण होते हैं और इसलिए यह 15 है। इन पञ्चभूत (पंचतत्व या पंचमहाभूत) भारतीय दर्शन में सभी पदार्थों के मूल माने गए हैं। आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी - ये पंचमहाभूत माने गए हैं जिनसे सृष्टि का प्रत्येक पदार्थ बना है। लेकिन इनसे बने पदार्थ जड़ (यानि निर्जीव) होते हैं, सजीव बनने के लिए इनको आत्मा चाहिए। इन सभी का योग 15 होता है।

कामेश्वरी के ध्यानश्लोक में और अन्य सभी नित्य देवियों में भी यह उल्लेख किया गया है कि वह कामेश्वरी नित्य के समान ही शक्ति देवताओं से घिरी हुई है। शक्ति देवता हैं - मदन उनमादन, दीपन, मोहना, शोशना, अनंगकुसुमा, अनंग मेखला, अनंगमदाना, अनंग मदनतुरा, अनंग रेखा (गगन रेखा) अनंग वेगिनी (मदा वेजिनी) अनंग कुशा (शशिरखा) अनंग मालिनी (भुआवना पाल) श्रद्धा, प्रीति, रति, धृति, कांति, मनोरमा, मनोहरा, मनोरथा, मदनोनमदिनी, मोहिनी, दीपानी, शोशिनी वाशंकरी, सिंजिनी, सुभागा, प्रियदर्शना।

फिर शक्ति देवता भी चंद्रमा की 16 कलाएँ हैं जिनके नाम पूषा, अवेश, श्रीमानस, रति, प्रीति, धृति, बुद्धि, सौम्या, मरीचि, अंशुमेलिनी, शशिनी, अंगिरा, छाया, संपूर्ण मंडल, तुष्टि और अमृता हैं। फिर डाकिनी, राकिनी, लकिनी, काकिनी, साकिनी, हकिनी, याकिनी। अंत में बटुक, गणपा, दुर्गा और क्षेत्रेश।

एक बार जब हम कामेश्वरी नित्य की पूजा कर लेते हैं, तो हम एक साथ इन सभी शक्ति देवताओं की पूजा कर रहे होंगे।

कामेश्वरी, कामेश्वर की पत्नी जो श्री ललिता महा त्रिपुर सुंदरी के अलावा कोई नहीं है।

15 तिथि नित्य देवी के नाम:

कामेश्वरी, भगमालिनी, नित्यक्लिन्ना, भेरुंडा, वाहनवासिनी, महावज्रेश्वरी, शिवदुति, त्वरित, कुलसुंदरी, नित्या, नीलपटक, विजया, सर्वमंगला, ज्वालामालिनी, चित्रा। और 16वीं महानित्य श्री ललिता महात्रिपुरा सुंदरी हैं।

तिथि नित्य देवी पूजा श्री विद्या सपर्य पद्धति में वर्णित श्री चक्र नववर्ण पूजा का हिस्सा है। इन तिथि नित्य देवियों के लिए एक विस्तृत और विशेष पूजा भी है, उन्हें त्रिकोण के चारों ओर संलग्न चित्र में दिखाया गया है और प्रत्येक नित्य को पंच पूजा / षोडशोपचार पूजा / चतुहयष्टि उपचार पूजा की पेशकश की जाती है।

कैसे किया जाता है 
पूजा?

एक बड़ा त्रिभुज बनाया जाता है और उसके चारों ओर जैसा कि चित्र में दिखाया गया है, प्रत्येक नित्य के यंत्र बनाए जाते हैं। त्रिभुज के मध्य में श्री चक्र बना हुआ है।प्रत्येक नित्य को उपाचारों के साथ उनके मंत्रों और ध्यानश्लोक के साथ-साथ प्रत्येक नित्य को श्री सूक्त के एक श्लोक के साथ पूजा की जाती है और इस प्रकार 15 सूक्त से 15 नित्य तक और फिर से श्री चक्र को पूर्ण श्री सूक्त त्रिभुज के अंदर खींचा जाता है। फिर कामेश्वरी से शुरू होने वाली प्रत्येक नित्य की त्रिशती या ललिता रुद्र त्रिशती में पहले 20 नामों से पूजा करें। जब तक सभी 15 नित्यों की पूजा की जाती है तब तक लैता त्रिशती / ललिता रुद्र त्रिशती पूरी हो जाती है। तत्पश्चात पुनः पूर्ण ललिता त्रिशती/ललिता रुद्र त्रिशती से त्रिकोण के अंदर स्थित श्री चक्र की पूजा की जाती है। अंत में आरती, प्रार्थना और क्षमाप्रार्थना के साथ पूजा संपन्न होती है। पूजा के बाद सुवासिनी पूजा, कुमारी पूजा, वटुका पूजा भी की जाती है।

Friday, 3 February 2023

Shiva Natraj Stuti

शिव नटराज स्तुति – Shiva Natraj Stuti

नटराज स्तुति

सत सृष्टि तांडव रचयिता
नटराज राज नमो नमः l
हे आद्य गुरु शंकर पिता
नटराज राज नमो नमः ll

गंभीर नाद मृदंगना 
धबके उरे ब्रह्माडना l
नित होत नाद प्रचंडना
नटराज राज नमो नमः ll

शिर ज्ञान गंगा चंद्रमा 
चिद्ब्रह्म ज्योति ललाट मां l
विषनाग माला कंठ मां
नटराज राज नमो नमः ll

तवशक्ति वामांगे स्थिता 
हे चंद्रिका अपराजिता l
चहु वेद गाए संहिता
नटराज राज नमोः ll

Thursday, 2 February 2023

Lalitha Jayanti


ललिता जयंती: श्री ललितात्रिपुरसुंदरी की पूजा के लिए शुभ दिन l
माता ललिता को समर्पित, यह ललिता जयंती हर साल माघ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। इस वर्ष यह 5 फरवरी 2023 को है। इस दिन मां ललिता की पूरे विधि-विधान से पूजा की जाती है।  शास्त्रों के अनुसार माता ललिता को दस महाविद्याओं में तीसरी महाविद्या माना जाता है। ललिता जयंती पूरे विधि-विधान से की जाए तो माता ललिता प्रसन्न होकर व्यक्ति को जीवन में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।

ललिता जयंती क्यों मनाई जाती है?
इस दिन देवी ललिता की पूजा करने से भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। माता ललिता की पूरी श्रद्धा से पूजा करने से व्यक्ति जन्म मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।  इसलिए ललिता जयंती पर देवी ललिता की बड़ी श्रद्धा से पूजा की जाती है।

ललिता जयंती का महत्व:
देवी ललिता, जो पंच महाभूतों, या पांच तत्वों से जुड़ी हैं, ललिता जयंती पर सम्मानित की जाती हैं। लोगों का मानना है कि देवी ललिता पांच तत्वों का रूप या प्रतीक हैं: पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और अंतरिक्ष।

कहा जाता है कि माता ललिता की पूजा करने से सभी प्रकार की सिद्धियों की प्राप्ति होती है। मां ललिता को
राजराजेश्वरी, कामाक्षी, मीनाक्षी, षोडशी, त्रिपुर सुंदरी आदि नामों से भी जाना जाता है।

ललिता पंचमी पूजन सामग्री:
ललिता पंचमी की पूजा के लिए- कुमकुम, अक्षत, हल्दी, चंदन, अबीर, गुलाल, दीपक, घी, इत्र, पुष्प, दूध, जल, फल, मेवा, मौली, आसन, तांबे का लोटा, नारियल, इत्यादि चीजों को एकत्रित करके रख लें।

पूजन विधि:
मां ललिता की पूजा करना चाहते हैं तो इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नानादि कर लें और सफेद रंग के वस्त्र धारण करें।
इसके बाद एक चौकी लें और उस पर गंगाजल छिड़कें और स्वंय उतर दिशा की और बैठ जाएं फिर चौकी पर सफेद रंग का कपड़ा बिछाएं। 

चौकी पर कपड़ा बिछाने के बाद मां ललिता की तस्वीर स्थापित करें। यदि आपको तस्वीर न मिले तो आप श्री यंत्र भी स्थापित कर सकते हैं।

इसके बाद मां ललिता का कुमकुम से तिलक करें और उन्हें अक्षत, फल, फूल, दूध से बना प्रसाद या खीर अर्पित करें। 

यह सभी चीजें अर्पित करने के बाद मां ललिता की विधिवत पूजा करें और ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नमः॥ मंत्र का जाप करें। श्रीयंत्र पर कुमकुम चढ़ाएं और ललितासहस्रनाम/ललितात्रिशती/खड़गमाला स्तोत्र का जाप करें l

इसके बाद मां ललिता की कथा सुनें या पढ़ें। 
कथा पढ़ने के बाद मां ललिता की धूप व दीप से आरती उतारें। 

इसके बाद मां ललिता को सफेद रंग की मिठाई या खीर का भोग लगाएं और माता से पूजा में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा मांगें। 

ललिता देवी का प्रादुर्भाव कथा:
पौराणिक कथा के अनुसार, सतयुग में किसी समय एक बार मुनियों के एक समूह ने यज्ञ आयोजित किया l यज्ञ में सभी देवताओं को बुलाया गया था l जब राजा दक्ष आए तो सभी लोग खड़े हो गए लेकिन भगवान शिव खड़े नहीं हुए l भगवान शिव दक्ष के दामाद थे l

यह देख कर राजा दक्ष बेहद क्रोधित हुए l अपने इस अपमान का बदला लेने के लिए सती के पिता राजा प्रजापति दक्ष ने भी एक यज्ञ का आयोजन किया l

राजा प्रजापति दक्ष (जो भगवान ब्रह्मा के पुत्र थे) ने कंकण (बर्तमान कनखल) नामक स्थान (हरिद्वार) में एक यज्ञ किया था, इस यज्ञ का नाम वृहस्पति यज्ञ था। उन्होंने भगवान शिव से बदला लेने की इच्छा से यह यज्ञ किया था। दक्ष क्रोधित थे क्योंकि उनकी बेटी सती (उनकी 27 बेटियों में से एक) ने उनकी इच्छा के विरुद्ध 'योगी भगवान शिव' से विवाह किया था। 

उस यज्ञ में ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य देवी-देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन उन्होंने जान-बूझकर अपने जमाता भगवान शिव को इस यज्ञ का निमंत्रण नहीं भेजा l

देवर्षि नारद जी ने देवी सती को बताया कि आपकी सब बहनें यज्ञ में आमंत्रित हैं, अतः आपको भी वहां जाना चाहिये। पहले तो देवी सती ने मन में कुछ देर विचार किया, फिर वहां जाने का निश्चय किया। जब देवी सती ने भगवान शिव से उस यज्ञ में जाने की अनुमति मांगी तो भगवान शिव ने वहां जाना अनुचित बताकर उन्हें जाने से रोका, पर देवी सती अपने निश्चय पर अटल रहीं।

वह बोलीं मैं प्रजापति के यज्ञ में अवश्य जाऊँगी और वहां पहुंच कर या तो अपने प्राणेश्वर देवाधिदेव के लिये यज्ञ में भाग प्राप्त करूँगी या यज्ञ को ही नष्ट कर दूंगी "प्राप्सयामि यज्ञभागं वा नाशयिष्यामि वा मुखम्" l

ऐसा कहते हुए देवी सती के नेत्र लाल हो गये। उनके अधर फड़कने लगे जो कृष्ण वर्ण के हो गए । क्रोध अग्नि से उददीप्त शरीर महा भयानक एवं उग्र दीखने लगा। उस समय महामाया का विग्रह प्रचण्ड तेज से तमतमा रहा था।

शरीर वृद्धावस्था को प्राप्त-सा हो गया। उनकी केश राशि बिखरी हुई थी, चार भुजाओं से सुशोभित वह महादेवी पराक्रम की वर्षा करती सी प्रतीत हो रही थीं।

काल अग्नि के समान महा भयानक रूप में देवी मुण्ड माला पहने हुई थीं और उनकी भयानक जिहृा बाहर निकली हुई थी, सिर पर अर्धचन्द्र सुशोभित था और उनका सम्पूर्ण विग्रह विकराल लग रहा था। वह बार – बार भीषण हुंकार कर रही थीं।

इस प्रकार अपने तेज से देदीप्यमान एवं अति भयानक रूप धारण कर महादेवी सती घोर गर्जना के साथ अटटहास करती हुई भगवान शिव के समक्ष खड़ी हो गयीं। देवी का यह भीषणतम स्वरूप साक्षात महादेव के लिये भी असहनीय हो गया।

भगवान शिव का धैर्य जाता रहा। उनका वह रूप असहनीय होने से शंकर जी वहां से हट गए और सभी दिशाओं में इधर – उधर गति करने लगे। देवी ने उन्हें ‘रुक जाइये’, ‘मत जाइये’ कई बार कहा, किंतु शिव एक क्षण भी वहां नहीं रूके।

इस प्रकार अपने स्वामी को विचलित देख कर दयावती भगवती सती ने उन्हें रोकने की इच्छा से क्षण भर में अपने ही शरीर से अपनी अंगभूता दस देवियों को प्रकट कर दिया, जो दसों दिशाओं में उनके समक्ष स्थित हो गयीं। भगवान शिव जिस – जिस दिशा में जाते थे, भगवती का एक एक विग्रह उनका मार्ग अवरूद्ध कर देता था।

देवी की ये स्वरूपा शक्तियाँ ही दस महाविद्याएँ हैं, इनके नाम हैं – काली, तारा, त्रिपुरसुंदरी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुरभैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला।

जब भगवान शिव ने इन महाविद्याओं का परिचय पूछा तो देवी बोलीं – कृष्ण वर्णा तथा भयानक नेत्रों वाली ये जो देवी आपके सामने स्थित हैं, वह भगवती ‘काली’ हैं और जो यह श्याम वर्ण वाली देवी आपके ऊर्ध्व भाग में विराजमान हैं, वह साक्षात महाकाल स्वरूपिणी महाविद्या ‘तारा’ हैं।

महामते! आपके दाहिनी ओर वह जो भयदायिनी तथा मस्तक विहीन देवी विराजमान हैं, वह महाविद्या स्वरूपिणी भगवती ‘छिन्नमस्ता’ हैं। शम्भो! आपके बायीं ओर यह जो देवी हैं, वह भगवती ‘भुवनेश्वरी’ हैं।

जो देवी आपके पीछे स्थित हैं, वह शत्रुनाशिनी भगवती ‘बगला’ हैं। विधवा का रूप धारण की हुई यह जो देवी आपके अग्नि कोण में विराजमान हैं, वह महाविद्या स्वरूपिणी महेश्वरी ‘धूमावती’ हैं और आपके नैर्ऋत्यकोण में ये जो देवी हैं, वह भगवती (ललिता) 'त्रिपुरसुंदरी’ हैं।

आपके वायव्यकोण में जो देवी हैं, वह मातङ्ग कन्या महाविद्या ‘मातङ्गी’ हैं और आपके ईशान कोण में जो देवी स्थित हैं, वह महाविधा स्वरूपिणी महेश्वरी ‘षोडशी’ हैं।
और मैं खुद भैरवी रूप में अभयदान देने के लिए आपके सामने खड़ी हूं।' यही दस महाविद्या अर्थात् दस शक्ति है।

बाद में मां ने अपनी इन्हीं शक्तियां का उपयोग दैत्यों और राक्षसों का वध करने के लिए किया था।

प्रवृति के अनुसार दस महाविद्या के तीन समूह हैं।

पहला : - सौम्य कोटि (त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, मातंगी, कमला),
दूसरा : - उग्र कोटि (काली, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी),
तीसरा : - सौम्य-उग्र कोटि (तारा और त्रिपुर भैरवी)।

यह सभी रूप भगवती के अन्य समस्त रूपों से उत्कृष्ट हुईं हैं। ये देवियाँ नित्य भक्तिपूर्वक उपासना करने वाले साधक पुरूषों को चारों प्रकार के पुरूषार्थ ( धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ) तथा समस्त वांछित फल प्रदान करती हैं।

शिव ने अंततः उन्हें अपने गणों के साथ वृहस्पति यज्ञ में
जाने की अनुमति दी।

लेकिन बिन बुलाए मेहमान होने के कारण सती को उनके पिता ने कोई सम्मान नहीं दिया। और भी, दक्ष ने शिव का अपमान किया। सती अपने पति के प्रति अपने पिता के अपमान को सहन करने में असमर्थ थीं, इसलिए उन्होंने यज्ञ-कुंड में कूदकर अपनी प्राणाहुति दे दी l

भगवान शंकर को जब यह पता चला तो क्रोध से उनका तीसरा नेत्र खुल गया l ब्रम्हाण्ड में प्रलय व हाहाकार मच गया l वह अपने गणों (अनुयायियों) के साथ उस स्थान पर गए जहाँ दक्ष अपना हवन कर रहे थे।
शिव जी के आदेश पर वीरभद्र ने दक्ष का सिर काट दिया और अन्य देवताओं को शिव निंदा सुनने की भी सजा दी l भगवान शंकर ने यज्ञकुंड से सती के पार्थिव शरीर को निकाल कंधे पर उठा लिये और दुःखी होकर सारे भूमंडल में घूमने लगे l

भगवती सती ने शिवजी को दर्शन दिए और कहा कि जिस-जिस स्थान पर उनके शरीर के अंग अलग होकर गिरेंगे, वहां महाशक्तिपीठ का उदय होगा सती का शव लेकर शिव पृथ्वी पर घूमते हुए तांडव भी करने लगे, जिससे पृथ्वी पर प्रलय की स्थिति उत्पन्न होने लगी l पृथ्वी समेत तीनों लोकों को व्याकुल देखकर भगवान विष्णु अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खंड-खंड कर धरती पर गिराते गए l जब-जब शिव नृत्य मुद्रा में पैर पटकते, विष्णु अपने चक्र से माता के शरीर का कोई अंग काटकर उसके टुकड़े पृथ्वी पर गिरा देते l
शरीर के विभिन्न भाग पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में कई स्थानों पर गिरे और उन स्थानों का निर्माण किया जिन्हें शक्तिपीठ के रूप में जाना जाता है।

आप अपने और अपने प्रियजनों के लिए श्री यंत्र पूजा और ललिततासहस्रनाम जाप के लिए 
"देवी शक्ति पीठ" में अनुरोध कर कर सकते हैं l







Shri Indrakshi Kavacham

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